Friday, 3 May 2019

एक किरण

कुछ इस तरह जिंदगी बित सी रही थी
शाम के बाद मेरे आगन,
मानो दफन हो जाते मेरे कुछ खावब
इन्ही अंधेरो मे।
ले जाती ये ढलती शाम सूरज की गरमी ,
घर-घर दीप जलाते पूरी करने सूरज की कमी,
कुछ इस तरह जिंदगी बित सी रही थी
शाम के बाद मेरे आगन,
दुर्गम पथ पर चलते थे अँधेरो मे,
ढूढंने निकलते मानव और पशुता का अंतर,
बस इस तरह जिंदगी बित सी रही थी,
शाम के बाद मेरे आगन,
चले आसमान की ओर ढूँढने कोई और सभ्यता,
पर आज भी मेरा गाँव अंधेरो में ही बस्ता,
मन मे यह सवाल सौ बार गूंजता,
इन्ही सवालो के बीच,
एकांत मे जलती हुई एक सौर किरण,
कर गई रोशन हर गली चौबारा,
अब मुट्टी भर धुप समेटे हुए,
हो रहा है रोशन गाँव मेरा,
अब उजल अक्षरो में इतिहास,
लिखेगा यही गांव मेरा,
बस इस तरह अब जिंदगी बितेगी,
शाम के बाद मेरे आगन।
-सोनेश

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